मौन की महिमा

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मौन का अर्थ केवल चुप रहना नहीं है बल्कि यह महान गुण आत्मसंयमआत्म चिंतन का प्रतीक है। जब व्यक्ति अनावश्यक वाणी से बचता है तो उसकी मानसिक और आत्मिक शक्ति बढ़ती है। हमारे प्राचीन ग्रंथो ऋषि मुनियों और दार्शनिकों ने मौन को जीवन की महत्वपूर्ण साधन बताया है। यह न केवल आत्मिक उन्नति में सहायक है बल्कि व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में भी उपयोगी है। 

मौन दो प्रकार का होता है ,

1 शारीरिक मन - जब व्यक्ति अपने मुख से कोई शब्द नहीं बोलता।

2 मानसिक मौन - जब मन में कोई व्यर्थ विचार उत्पन्न नहीं होते और शांति बनी रहती है।

मौन का महत्व


आत्म नियंत्रण और आत्म शक्ति का स्रोत


मौन से आत्म नियंत्रण की भावना विकसित होती है। जो व्यक्ति अपनी वाणी पर संयम रख सकता है, वह अपनी भावनाओं और इच्छाओं को भी नियंत्रित कर सकता है। महात्मा गांधी का जीवन मौन की शक्ति का उत्कृष्ट उदाहरण है। वह सप्ताह में एक दिन मौन धारण करते थे जिससे उन्हें आत्म मंथन की शक्ति और मानसिक शांति मिलती थी।

विवादों से बचाने वाला


कई बार बहस और विवादों में वाणी से निकले शब्द रिश्तों को खराब कर देते हैं ऐसे में मौन धारण करना विवादों को डालने का सबसे अच्छा उपाय है। एक ऑफिस में दो सा कर्मचारी के बीच किसी प्रोजेक्ट को लेकर मतभेद हो गया। एक सहकर्मी क्रोधित होकर उनकी आवाज में बहस करने लगा लेकिन दूसरा मौन रहा और संयम बनाए रखा। बाद में जब माहौल शांत हुआ तो उन्होंने समझदारी से समस्या का समाधान निकाल।

मानसिक शांति और ध्यान में सहायक


मौन मानसिक शांति को बढ़ाता है। जब व्यक्ति काम बोलता है और अधिक चिंतन करता है तो उसकी विचारधारा स्पष्ट होती है और वह तनाव से मुक्त रहता है। ध्यान और योग में मां का विशेष महत्व है। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि मौन आत्म चिंतन और आरामबोध का सबसे बड़ा साधन है। वह ध्यान और आत्म चिंतन के लिए नियमित रूप से मौन का अभ्यास करते थे।

बोलने की प्रभावशीलता बढ़ता है

जो व्यक्ति काम और सारगर्भित बोलता है, उसकी बातों का प्रभाव अधिक होता है। उसकी वाणी में वजन और गहराई होती है।

अब्राहम लिंकन ने कहा था यदि मुझे बोलने के लिए 10 मिनट दिए जाएं तो मैं 9 मिनट सोने में लगाऊंगा और 1 मिनट बोलने में इस प्रकार सोच समझकर बोलेंगे शब्दों की महत्व अधिक होती है

रिश्तो को मधुर बनाए रखना है


कई बार गलतफहमी के कारण रिश्तो में दरार आ जाती है। ऐसे में यदि व्यक्ति मौन रहकर संयम रखें और सोच समझकर शब्दों का प्रयोग करें तो रिश्ते खराब होने से बच सकते हैं। पति-पत्नी के बीच अक्षर छोटी-छोटी बातों पर बहस होती है। यदि कोई एक व्यक्ति संयम से काम ले और तुरंत प्रतिक्रिया देने की बजाय शांत रहे तो झगड़ा तले जा सकते हैं।

आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग


मौन केवल बाहरी नहीं बल्कि आंतरिक भी होता है। जब व्यक्ति मन को शांत कर लेता है तब वह आत्मज्ञान प्राप्त करता है। ध्यान साधना और तपस्या में मौन की विशेष भूमिका होती है। बुद्ध ने मौन को ध्यान और आत्मज्ञान का महत्वपूर्ण साधन बताया था। वे स्वयं ध्यान के माध्यम से मौन धारण करते थे और आत्मबोध की ओर अग्रसर होते थे।

मौन को जीवन में कैसे अपनाएं?


हर दिन कुछ समय के लिए मौन रहे कम से कम 10-15 मिनट मौन रहकर आत्म चिंतन करें। सोच समझ कर बोले बोलने से पहले विचार करें की क्या मेरी बात आवश्यक और सार्थक है। क्रोध में मौन धारण करें, गुस्से में आकर कुछ भी कहने से बेहतर है कि कुछ समय के लिए शांत रहें। योग का अभ्यास करें एसएससी मानसिक शक्ति बढ़ेगी और आंतरिक मां को अनुभव किया जा सकेगा। अनावश्यक बहस से बचें व्यर्थ की चर्चाओं और वाद विवाद में पढ़ने से बेहतर है कि मौन रहकर स्थिति को समझें।

स्वामी विवेकानंद के मौन से जुड़े मुख्य संदेश


स्वामी विवेकानंद का मन के प्रति विशेष सुझाव था और उन्होंने अपने जीवन में कई बार मां की महिमा को सिद्ध किया। यहां कुछ महत्वपूर्ण उदाहरण दिए गए हैं:

* जब भी विपरीत परिस्थितियों आए घबराने या भागने की बजाय धैर्य और मौन सबसे अच्छा उपाय है। 
* मौन और आत्म संयम से हम किसी भी समस्या का समाधान कर सकते हैं। 
* जब भी कोई बड़ा निर्णय लेना हो मन में रहकर आत्म चिंतन करें। 
* मौन से विचार शक्ति और आत्मविश्वास बढ़ता है। 
* मौन हमें सही उत्तर खोजने का अवसर देता है।
* व्यर्थ तर्क वितर्क से बचने में मौन बहुत उपयोगी होता है। 
* मौन रखने से मां को शुद्ध करने में मदद मिलती है और आत्मा को उच्च स्तर तक पहुंचा जा सकता है। 
* मोनू केवल शब्दों को रोकने का नाम नहीं बल्कि यह आत्म शुद्धि और मानसिक शांति मानसिक शक्ति का मार्ग भी है। 
* मौन कोई कमजोरी नहीं बल्कि यह सबसे बड़ी शक्ति है आत्म संयम धैर्य और सफलता की कुंजी है। 

जब तक आप बोलते रहेंगे तब तक आपके बाल वही दोहराएंगे और आप पहले से जानते हैं लेकिन जब आप मौन रहेंगे तभी आपको कुछ नया सीखने का ऑप्शन मिलेगा।
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